Narendra Modi
नरेंद्र मोदी फ़ैक्ट्स

नरेंद्र मोदी 2014 के आम चुनाव में भारत का प्रधानमंत्री बन गया। इधर उस पर जानकारी और विश्लेषण (analysis) हैं।


क्या कानून ने मोदी को अपराधी ठहराया?

कुछ लोगों का कहना है कि उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट), जो भारत की एक ईमानदार संस्था मानी जाती है, ने नरेंद्र मोदी को निर्दोष पाया है। पर सच यह है कि मोदी के खिलाफ़ न मुकदमा चला है और न उसको निरपराध पाया गया है। आज तक सवाल यह रहा है कि 2002 हिंसा के मामले में मोदी के खिलाफ़ मुकदमा चलाया जाना चाहिए कि नहीं। 2010 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए विशेष जांच दल (एसआईटी) ने हिंसा के बारे में मोदी से सवाल पूछे, लेकिन मोदी ने कई घटनाओं को भूलने का दावा किया, और किसी भी तरह की ज़िम्मेदारी से इनकार किया।

एसआईटी ने अपने अंतिम रिपोर्ट में कहा कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का कोई ठोस सबूत नहीं है। लेकिन एसआईटी का स्वयं इकट्ठा किया सबूत इस राय के साथ असंगत है। सुप्रीम कोर्ट के एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन ने भी कहा कि इस आदेश की व्याख्या मोदी को 'क्लीन चिट' के रूप में करना पूरी तरह से गलत निष्कर्ष है। रामचंद्रन ने आगे यह भी कहा कि मोदी के खिलाफ़ कानूनी कार्यवाई के लिए काफ़ी सबूत है

गुजरात के पूर्व डीजीपी आर बी श्रीकुमार और दूसरे टिप्पणीकारों ने एसआईटी की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाए हैं (मिसाल के लिए देखिए: द हिंदू, कम्युनलिज़्म कॉम्बाट और एनडीटीवी)। इन विश्लेषणों के अनुसार एसआईटी के रिपोर्ट में कई तार्किक और तथ्यात्मक ग़लतियाँ हैं और कई सबूतों की उपेक्षा की गई है; एसआईटी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की भी उपेक्षा करते हुए गुजरात 2002 के पीछे साज़िश की जाँच नहीं की। मनोज मित्ता की नई किताब "द फिक्शन ऑफ़ फैक्ट फाइंडिंग: मोदी एंड गोधरा" में गुजरात 2002 हत्याकांड की जाँच की कमजोरियाँ ज़ाहिर की गई है।

इस संदर्भ में फ़रवरी 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने ज़किया जाफ़री को एसआईटी रिपोर्ट के खिलाफ़ याचिका दर्ज करने की इजाज़त दी, लेकिन दिसम्बर 2013 में गुजरात कोर्ट ने याचिका नामंज़ूर कर दी। ज़किया जाफ़री ने गुजरात हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है। अगर यह अर्ज़ी सफ़ल होगी तो मोदी के खिलाफ़ अभियोग का रास्ता खुल सकता है। अर्ज़ी का समर्थन करने वाला संगठन सिटिज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस ने केस पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार किए हैं। कई एनजीओ और शख़्सों का मानना है कि मोदी को अदालत के सामने लाया जाना चाहिए - इनमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कन्‍डेय काटजू भी शामिल हैं। लेकिन फ़िलहाल यह बात अस्पष्ट है कि मोदी के सहपराधिता के सबूत की कभी अदालत में जांच होगी या नहीं।